बहादराबाद, हरिद्वार। आधुनिक दौर में बच्चों को बेहतर शिक्षा, तकनीक और तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन माता-पिता और बच्चों के बीच कम होता संवाद चिंता का विषय बनता जा रहा है। बच्चों के स्वस्थ व्यक्तित्व और भावनात्मक विकास के लिए उन्हें सुविधाओं से अधिक माता-पिता का समय, स्नेह, ध्यान और भरोसे की जरूरत होती है। यह कहना है राजकमल साइंस एंड मैनेजमेंट कॉलेज, बहादराबाद, हरिद्वार के प्रधानाचार्य डॉ. राघवेन्द्र चौहान का।
अतुल्य भारत मीडिया ग्रुप से बातचीत में डॉ. राघवेन्द्र चौहान ने कहा कि आज बच्चों के पास अच्छे स्कूल, मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन कई परिवारों में बच्चों से बैठकर बात करने और उनकी भावनाओं को समझने के लिए पर्याप्त समय नहीं निकल पा रहा है। इसका प्रभाव उनके व्यवहार और भावनात्मक विकास पर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि अभिभावक अक्सर शिकायत करते हैं कि बच्चे मोबाइल और इंटरनेट पर अधिक समय बिता रहे हैं तथा परिवार से दूरी बना रहे हैं। ऐसे में केवल बच्चे को दोष देने के बजाय यह समझने की जरूरत है कि वह स्क्रीन की दुनिया की ओर इतना आकर्षित क्यों हो रहा है। डॉ. राघवेन्द्र चौहान के अनुसार, कई बार बच्चे घर में जिस अपनापन, ध्यान और संवाद की तलाश करते हैं, उसे वे मोबाइल और डिजिटल दुनिया में खोजने लगते हैं।
डॉ. राघवेन्द्र चौहान ने कहा कि बच्चों को महंगे संसाधनों और सुविधाओं से कहीं अधिक माता-पिता का साथ चाहिए। उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि वे अपने मन की बात बिना डर और झिझक के माता-पिता से साझा कर सकते हैं। अभिभावकों को बच्चों की बात सुनते समय तुरंत डांटने या निर्णय सुनाने के बजाय पहले उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बच्चों में संस्कार केवल उपदेश देने से विकसित नहीं होते, बल्कि वे अपने माता-पिता के व्यवहार को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। यदि अभिभावक चाहते हैं कि बच्चे मोबाइल का सीमित इस्तेमाल करें, परिवार के साथ समय बिताएं और दूसरों का सम्मान करें तो उन्हें भी अपने आचरण के माध्यम से उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
अभिभावकों से अपील करते हुए डॉ. राघवेन्द्र चौहान ने कहा कि प्रतिदिन कुछ समय ऐसा जरूर होना चाहिए, जब माता-पिता मोबाइल, टीवी और दूसरी व्यस्तताओं से दूर रहकर केवल बच्चों के साथ समय बिताएं। उनसे उनके दिन, स्कूल, दोस्तों, खुशियों और परेशानियों के बारे में सहजता से बातचीत करें। इससे बच्चों में अपनी बात साझा करने का विश्वास विकसित होगा।
उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल यह महसूस कराना पर्याप्त नहीं है कि उनके पास कितनी सुविधाएं हैं, बल्कि उन्हें यह एहसास भी होना चाहिए कि उनके साथ कौन खड़ा है। माता-पिता का भरोसा, प्रेम और सहयोग बच्चों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।
डॉ. राघवेन्द्र चौहान ने कहा कि अच्छी परवरिश का उद्देश्य केवल बच्चे को शैक्षणिक या व्यावसायिक रूप से सफल बनाना नहीं होना चाहिए। वास्तविक सफलता तब है, जब बच्चा आत्मविश्वासी, संवेदनशील, संस्कारी और जिम्मेदार इंसान बने। उन्होंने कहा कि बचपन जीवन का ऐसा दौर है जो दोबारा लौटकर नहीं आता। इसलिए अभिभावकों को बच्चों के साथ समय बिताने और उनसे खुलकर संवाद करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। बच्चों को हमारी सुविधाओं से कहीं ज्यादा हमारा समय, संवाद, साथ और विश्वास चाहिए।





















