प्रधानमंत्री के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ
नए साल की शुरुआत के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हैं—एक देश के भीतर और दूसरी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर। दोनों ही मोर्चों पर उन्हें तेज़, संतुलित और साहसिक फैसले लेने होंगे।
घरेलू चुनौती: धीमी होती अर्थव्यवस्था
देश की अर्थव्यवस्था इस समय दबाव में है। वित्त वर्ष 2024-25 की पहली छमाही के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हुई है। दूसरी तिमाही में GDP ग्रोथ गिरकर 5.4 प्रतिशत रह गई, जो पिछले सात तिमाहियों में सबसे कम है। कई रेटिंग एजेंसियों ने भी पूरे साल की ग्रोथ दर का अनुमान घटा दिया है।
हालाँकि भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है, लेकिन विकास असमान है। अमीर वर्ग की स्थिति बेहतर होती दिख रही है, जबकि गरीब और मध्यम वर्ग संघर्ष कर रहा है। इसे विशेषज्ञ “K-आकार की वृद्धि” कह रहे हैं।
इसके संकेत कई क्षेत्रों में दिखते हैं। रेलवे में यात्रियों की संख्या कोविड से पहले के स्तर से काफी कम है, दोपहिया वाहनों की बिक्री घटी है और FMCG उत्पादों की मांग कमजोर बनी हुई है। रियल एस्टेट में महंगे घरों की बिक्री बढ़ रही है, लेकिन सस्ते घरों की मांग घट रही है। इसका कारण बढ़ती महंगाई, धीमी वेतन वृद्धि और ऊँची जीवन लागत मानी जा रही है।
इसी आर्थिक दबाव के चलते राजनीतिक दल मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज) का सहारा ले रहे हैं। सरकार ने भी प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को आगे बढ़ाया है, जिसके तहत करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन मिलता है। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया। हालाँकि बाद में हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में जीत से सरकार ने अपनी स्थिति मजबूत की।
सुधारों की ज़रूरत
आने वाला केंद्रीय बजट सरकार के लिए बड़ा मौका हो सकता है। सरकार का फोकस गरीब और मध्यम वर्ग की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और आर्थिक विकास को गति देने पर हो सकता है। शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट, इंडस्ट्रियल पार्क, मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिए जाने की उम्मीद है।
मध्यम वर्ग लंबे समय से आयकर में राहत की मांग कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि टैक्स स्लैब में बदलाव या अधिकतम टैक्स दर घटाने से खपत बढ़ सकती है। इसके अलावा कृषि सुधार, उर्वरक सब्सिडी की समीक्षा, GST में सुधार, PSU विनिवेश और बैंकिंग सेक्टर में बदलाव जैसे कदम भी ज़रूरी माने जा रहे हैं।
वैश्विक चुनौती: अमेरिका और ट्रंप फैक्टर
दूसरी बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। जनवरी में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ सकती है। ट्रंप पहले भी भारत को “टैरिफ किंग” कह चुके हैं और वे भारतीय उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने या वीज़ा नियम सख्त करने जैसे कदम उठा सकते हैं।
अमेरिका में अवैध भारतीय प्रवासियों और H-1B वीज़ा पर काम करने वाले भारतीय पेशेवरों को लेकर भी तनाव की संभावना है। लेकिन चीन पर सख्त रुख भारत के लिए अवसर भी ला सकता है। चीन से हटकर अमेरिका यदि दूसरे देशों से आयात बढ़ाता है, तो भारत को टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और कृषि उत्पादों में फायदा मिल सकता है।
संतुलन की परीक्षा
प्रधानमंत्री के सामने विकल्प आसान नहीं हैं। अगर वे अमेरिका को खुश करने के लिए टैरिफ कम करते हैं या प्रवास के मुद्दे पर रियायत देते हैं, तो देश के भीतर असंतोष बढ़ सकता है। लेकिन अगर सही रणनीति अपनाई गई, तो यह दौर भारत के लिए 1991 जैसे बड़े सुधारों का मौका भी बन सकता है।
आने वाला साल तय करेगा कि भारत आर्थिक चुनौतियों से जूझते हुए “विकसित भारत” के लक्ष्य की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ता है।





















