देहरादून। हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता तापमान और ग्लेशियरों का लगातार पिघलना पर्यावरण के साथ-साथ भूकंपीय सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों के विभिन्न अध्ययनों में इस बात पर मंथन किया जा रहा है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और मौसम की चरम घटनाओं से पहाड़ों के भूगर्भीय संतुलन पर किस तरह का प्रभाव पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने से फॉल्ट लाइनों पर तनाव में बदलाव की स्थिति बन सकती है, हालांकि भूकंप की आवृत्ति और तीव्रता को केवल जलवायु परिवर्तन से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 1 मार्च से 28 अगस्त 2026 के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में करीब 35 बार भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की गईं। बागेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, पौड़ी गढ़वाल, चमोली और उत्तरकाशी समेत कई जिलों में भूकंप के झटके महसूस किए गए। लगातार सामने आ रही भूकंपीय गतिविधियों के बीच हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भीय बदलावों को लेकर वैज्ञानिकों की निगरानी भी बढ़ी है।
ग्लेशियरों के पिघलने से बदल सकता है भूगर्भीय तनाव
वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों में जमा बर्फ का भार पहाड़ी भू-भाग पर एक तरह का दबाव बनाए रखता है। ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने और बर्फ के द्रव्यमान में कमी आने से स्थानीय स्तर पर धरातल पर पड़ने वाले दबाव में बदलाव हो सकता है। ऐसे बदलाव पहले से तनावग्रस्त या सक्रिय फॉल्ट लाइनों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में छोटी भूकंपीय गतिविधियों की स्थिति बन सकती है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि भूकंप बेहद जटिल भूगर्भीय प्रक्रिया का परिणाम होते हैं। किसी क्षेत्र में भूकंप की संभावना को केवल ग्लेशियरों के पिघलने या जलवायु परिवर्तन के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता।
देहरादून भारी बारिश और बाढ़ से बढ़ता भूस्खलन का खतरा
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती चरम मौसमी घटनाएं भी भूगर्भीय अस्थिरता को प्रभावित कर रही हैं। भारी बारिश और बाढ़ के दौरान पहाड़ी ढलानों में पानी का दबाव बढ़ता है, जिससे मिट्टी और चट्टानों की पकड़ कमजोर हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में भूस्खलन और अन्य भू-आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है।
देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी समेत विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिक हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों में बदलाव, भूगर्भीय संरचना और भूकंपीय गतिविधियों के बीच संबंधों का अध्ययन कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों के प्रवाह और जलस्तर में बदलाव के साथ पहाड़ी ढलानों पर पानी का संचय भी बढ़ सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर मिट्टी और चट्टानों की स्थिरता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
उत्तराखंड क्यों है संवेदनशील
देहरादून उत्तराखंड हिमालय के उन हिस्सों में शामिल है जहां कई सक्रिय भूगर्भीय संरचनाएं मौजूद हैं। मेन सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) सहित प्रमुख भ्रंश रेखाएं इस क्षेत्र को भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील बनाती हैं। इसी वजह से राज्य के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर भूकंप के झटके महसूस होते हैं।
वैज्ञानिकों की चिंता का एक प्रमुख कारण यह भी है कि मध्य हिमालय के कुछ हिस्सों में लंबे समय से बड़े भूकंप की घटना नहीं हुई है। ऐसे में भूगर्भ में जमा तनाव और ऊर्जा को लेकर वैज्ञानिक लगातार निगरानी की आवश्यकता पर जोर देते हैं। हालांकि किसी बड़े भूकंप के आने का समय या उसकी तीव्रता की सटीक भविष्यवाणी वर्तमान वैज्ञानिक तकनीक से संभव नहीं है।
देहरादून बड़े भूकंप की आशंका पर वैज्ञानिकों की नजर
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के भू-विज्ञानी डॉ. नरेश कुमार के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में 7 मैग्नीट्यूड से अधिक तीव्रता के भूकंप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता और उत्तराखंड का बड़ा हिस्सा भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है।
उनके अनुसार अब तक के अध्ययनों में यह सामने आया है कि हिमालय में बड़े और तीव्र भूकंपों के लिहाज से उच्च हिमालयी क्षेत्र विशेष महत्व रखता है। उत्तराखंड का चमोली और उत्तरकाशी क्षेत्र, हिमाचल प्रदेश का कांगड़ा क्षेत्र तथा नेपाल का काठमांडू क्षेत्र ऐसे इलाकों में शामिल हैं, जहां भूकंपीय गतिविधियों पर वैज्ञानिकों की विशेष नजर रहती है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पीछे हटना, अनियमित और अत्यधिक वर्षा, बाढ़, सूखे तथा वनाग्नि जैसी घटनाएं पहाड़ी पर्यावरण के संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।
ऐसे में आने वाले समय में हिमालयी क्षेत्रों के लिए चुनौती केवल भूकंप तक सीमित नहीं रहने वाली है। ग्लेशियरों के पिघलने, भूस्खलन, बाढ़ और बदलते मौसम के संयुक्त प्रभावों को समझना और संवेदनशील क्षेत्रों की लगातार वैज्ञानिक निगरानी करना आपदा जोखिम को कम करने के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।





















