हरिद्वार। पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के साथ पितृ पक्ष का शुभारंभ हो गया है। पितृ पक्ष के अवसर पर धर्मनगरी हरिद्वार में पितृ कर्म, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है।
हरिद्वार के मायापुर स्थित नारायणी शिला मंदिर में श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं। यहां श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के साथ नारायण बलि सहित अन्य पितृ कर्म भी संपन्न कराए जाते हैं। पितृ पक्ष के दौरान नारायणी शिला पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
हरिद्वार धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरिद्वार की नारायणी शिला पितृ कर्म के लिए विशेष महत्व रखने वाला तीर्थ है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा भगवान विष्णु और गयासुर से संबंधित बताई जाती है।
भगवान विष्णु और गयासुर से जुड़ी है पौराणिक कथा
हरिद्वार नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज कुमार त्रिपाठी के अनुसार, वायु पुराण में वर्णित कथा के मुताबिक गयासुर नामक राक्षस भगवान विष्णु से बैर करने के लिए बदरीकाश्रम गया था। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु के श्रीविग्रह से जुड़ी घटना के दौरान उसके अलग-अलग हिस्से तीन प्रमुख स्थानों पर गिरे। भगवान विष्णु का मस्तक बदरीनाथ स्थित ब्रह्मकपाल, हृदय और कंठ से नाभि तक का हिस्सा हरिद्वार की नारायणी शिला तथा चरण बिहार के गया में गिरने की मान्यता है।
धार्मिक मान्यता है कि गयासुर के भगवान विष्णु के चरणों में पहुंचने के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसके बाद भगवान विष्णु ने इन तीनों स्थानों पर अपने वास का आशीर्वाद दिया।
हरिद्वार
मान्यता के अनुसार, इन पवित्र स्थलों पर पितरों के निमित्त पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु के हृदय में माता लक्ष्मी के निवास की धार्मिक मान्यता के चलते नारायणी शिला पर किए जाने वाले श्राद्ध और पितृ कर्म को विशेष महत्व दिया जाता है।
नारायणी शिला मंदिर में श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण और नारायण बलि जैसे अनुष्ठान कराए जाते हैं। धार्मिक विश्वास यह भी है कि श्रद्धा और सच्चे मन से पितरों का स्मरण करते हुए यहां जल अर्पित करने से भी पितरों की शांति और मोक्ष की कामना पूरी होती है।




















